आज अपराधी बंदूक लेकर नहीं आते…
वे सिर्फ़ एक लिंक भेजते हैं।
एक फोन कॉल…
एक OTP…
एक नकली वेबसाइट…
एक फर्जी नौकरी…
एक झूठा प्यार…
और कुछ ही मिनटों में किसी की पूरी जिंदगी बदल जाती है।
देश के अलग-अलग शहरों में लोग अलग-अलग तरह के ऑनलाइन फ्रॉड का शिकार हो रहे थे।
कहीं किसी बुज़ुर्ग की जीवनभर की कमाई गायब हो रही थी…
कहीं कोई छात्र ब्लैकमेल हो रहा था…
कहीं किसी महिला को नकली प्रेम जाल में फँसाया जा रहा था…
तो कहीं हजारों लोग निवेश और ऑनलाइन शॉपिंग के नाम पर लुट रहे थे।
शुरुआत में पुलिस इन सभी मामलों को अलग-अलग अपराध मानती रही।
लेकिन साइबर क्राइम यूनिट की डीसीपी अनन्या राठौड़ को एक बात बार-बार परेशान कर रही थी…
हर केस में कुछ डिजिटल पैटर्न एक जैसे थे।
एक ही तरह के सर्वर…
एक ही तरह की फर्जी पहचान…
और एक ऐसा डिजिटल सिग्नेचर…
जो हर अपराध के बाद गायब हो जाता था।
धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगा कि यह अलग-अलग अपराध नहीं…
बल्कि एक ही अंतरराष्ट्रीय साइबर नेटवर्क के हिस्से थे।
लेकिन सबसे खतरनाक बात यह थी…
कि इस पूरे नेटवर्क का असली मास्टरमाइंड…
कभी किसी कैमरे में दिखाई नहीं दिया।
