हर सुबह…
मीरा की नींद अलार्म से नहीं…
अपने बच्चों की आवाज़ों से खुलती थी।
“माँ… मेरी शर्ट कहाँ है?”
“माँ… टिफ़िन तैयार है?”
“माँ… जल्दी करो, देर हो रही है।”
लेकिन आज…
घर में सन्नाटा था।
बेटा विदेश में नौकरी कर रहा था।
बेटी अपनी शादी के बाद दूसरे शहर चली गई थी।
पति सुबह की चाय लेकर अख़बार में खो गए।
मीरा ने आदत से मजबूर होकर चार कप चाय बना दी।
जब ट्रे लेकर डाइनिंग टेबल तक पहुँची…
तभी उसकी नज़र दो खाली कुर्सियों पर पड़ी।
उसने धीरे-से दो कप वापस रख दिए।
उस दिन…
पहली बार…
उसे महसूस हुआ कि उसने पूरी ज़िंदगी सबके लिए जी…
लेकिन…
अपने लिए कभी नहीं।
आईने के सामने खड़ी होकर उसने खुद से पूछा—
“अगर मैं किसी की माँ नहीं होती… तो मैं कौन होती?”
उस सवाल का जवाब उसके पास नहीं था।
लेकिन…
शायद उसी सवाल से उसकी नई ज़िंदगी शुरू होने वाली थी।
