काल्पनिक पहाड़ी कस्बे अघोरगढ़ से लगभग सात किलोमीटर दूर बहती है—
वैतरणा नदी।
नदी के ऊपर 1906 में अंग्रेज़ी शासन के दौरान एक पत्थर का पुल बनाया गया था।
आधिकारिक नाम—
वैतरणा ब्रिज।
लेकिन स्थानीय लोग उसे कहते हैं—
मृतकों का पुल
कहा जाता है कि पुल के निर्माण के दौरान कई मजदूर नदी में गिरकर मारे गए थे।
फिर 1934 में एक पूरी बारात पुल पार करने के बाद रहस्यमयी तरीके से गायब हो गई।
1971 में चार कॉलेज छात्रों ने आधी रात पुल पार करने की शर्त लगाई।
अगली सुबह चारों के नाम अख़बार में शोक संदेश के रूप में छपे।
तीन अगले 24 घंटे में मर गए।
चौथा बच गया।
लेकिन…
उसने जीवन भर दोबारा कभी अपना नाम नहीं बोला।
1999 में प्रशासन ने पुल बंद कर दिया।
फिर भी हर कुछ वर्षों में कोई व्यक्ति रात में वहाँ पहुँचता है।
पुल पार करता है।
और अगली सुबह—
उसका नाम छप जाता है।
अन्वेषा पेशे से investigative documentary filmmaker है।
वह भूतों पर विश्वास नहीं करती।
वह अपने भाई की disappearance को supernatural मानने से इनकार करती है।
लेकिन अपने नाम वाला शोक संदेश देखने के बाद उसके पास केवल दो सवाल हैं—
निहाल कहाँ है?
और—
अख़बार को उसकी मौत का समय पहले से कैसे पता है?
All Chapters
- अध्याय 1 – रात का पुल
- अध्याय 2 – कल की मौत
- अध्याय 3 – अख़बार में मेरा नाम
- अध्याय 4 – पुल पर कौन बोलता है?
- अध्याय 5 – जो मरकर भी नहीं मरा
- अध्याय 6 – निहाल की आख़िरी रिकॉर्डिंग
- अध्याय 7 – निहाल की आख़िरी रिकॉर्डिंग
- अध्याय 8 – शोक संदेश कौन भेजता है?
- अध्याय 9 – पुल के नीचे
- अध्याय 10 – मौत की भविष्यवाणी
- अध्याय 11 – आख़िरी बार पुल पार
- अध्याय 12 – मृतकों का पुल
