खोई हुई पहचान की तलाश

खोई हुई पहचान की तलाश
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दिल्ली की साँस लेती सड़कों पर, जहाँ हर चौराहा नई कहानियाँ गढ़ता है, एक सुबह मीरा ठाकुर अपनी ही छाया से लड़ रही थी।
उसके हाथ में एक छोटा-सा सफ़ेद लिफ़ाफ़ा था, जिस पर सिर्फ़ तीन शब्द लिखे थे –
“तुम वही नहीं हो, जो तुम समझती हो।”
उसने कई बार कोशिश की कि वह इस वाक्य को समझ सके, पर हर बार उसका दिमाग़ खाली हो जाता। पिछले छह महीनों से उसकी याददाश्त टुकड़ों में बिखरी पड़ी थी। डॉक्टरों ने कहा – “डिसोसिएटिव एम्नेशिया”।
पर मीरा को लगता था कि यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि कोई बहुत बड़ा सच है जो उसे अंदर से खोखला कर रहा है।
उस रात, जब वह अपने छोटे से फ्लैट में अकेली बैठी थी, पुराने अखबार के एक कटिंग ने उसका ध्यान खींचा।
तस्वीर में एक औरत थी – लगभग उस जैसी दिखने वाली।
नीचे लिखा था:
“पाँच साल पहले लापता हुई दिल्ली की रहस्यमयी महिला – क्या वह अब भी ज़िंदा है?”
मीरा की उँगलियाँ काँप गईं।
वह औरत… उसकी आँखें… ठीक वैसी ही थीं, जैसी उसे हर सुबह शीशे में दिखती थीं।
फिर भी, वह औरत का नाम अलग था।
अनन्या राय चौधरी।
मीरा का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
क्या वह अनन्या है?
या अनन्या उसकी कोई खोई हुई बहन है?
या फिर… कुछ और भी भयानक?
उस रात मीरा ने फैसला किया – अब वह भागेगी नहीं।
अब वह सच की तलाश करेगी, चाहे उसमें उसके सबसे करीबी लोग ही क्यों न शामिल हों।
अंत तक का सफर शुरू होता है…

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