अठारह साल पहले हुए चार लोगों के हत्याकांड का अकेला जीवित गवाह विवान त्रिपाठी अचानक अपने पुराने शहर लौटकर दावा करता है कि उसने पुलिस और अदालत से सच छिपाया था। लेकिन पूरा बयान देने से पहले ही वह एक बंद होटल रूम से रहस्यमय ढंग से गायब हो जाता है। पीछे छूटती है एक पुरानी फोटोग्राफ, खून लगी चाबी और एक लाइन—“आख़िरी गवाह मैं नहीं हूँ।” जैसे-जैसे पुराना केस दोबारा खुलता है, सामने आता है कि विवान ने गायब होने से पहले अलग-अलग लोगों को अलग-अलग संदिग्धों के नाम दिए थे। अब सवाल केवल कातिल का नहीं, बल्कि उस दूसरे गवाह का है जो अठारह वर्षों से सच के साथ ज़िंदा है।
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- अध्याय 1 – वह वापस आ गया
- अध्याय 2 – आख़िरी गवाह मैं नहीं हूँ
- अध्याय 3 – तीन नाम
- अध्याय 4 – ग्यारह साल का बच्चा
- अध्याय 5 – पाँचवाँ चेहरा
- अध्याय 6 – वह चाबी किस दरवाज़े की थी?
- अध्याय 7 – चार हत्या नहीं थीं
- अध्याय 8 – जिसने बयान लिखवाया
- अध्याय 9 – विवान ने किसे बचाया?
- अध्याय 10 – उस रात कमरे में कौन-कौन था?
- अध्याय 11 – आख़िरी गवाह
- अध्याय 12 – गवाही
