शापित वंश

शापित वंश
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मध्यप्रदेश के काल्पनिक कस्बे सूर्यगढ़ से कुछ किलोमीटर दूर पहाड़ी पर स्थित थी— राजवंशी हवेली। लगभग डेढ़ सौ साल पुरानी हवेली। कभी इस परिवार के पास आसपास की हजारों एकड़ जमीन थी। आज जमींदारी समाप्त हो चुकी थी… लेकिन राजवंशी परिवार की संपत्ति, कारोबार और प्रभाव अब भी कायम था। परिवार के साथ एक कहानी भी पीढ़ियों से चली आ रही थी। कहा जाता था कि सन् 1876 में परिवार के पूर्वज ठाकुर रुद्रप्रताप राजवंशी ने एक ऐसा अपराध किया था जिसके बाद एक महिला ने मरते समय पूरे वंश को श्राप दिया— “तुम्हारे वंश का कोई पहला बेटा छत्तीसवाँ वर्ष नहीं देखेगा।” पहले लोगों ने इसे क्रोध में कही बात माना। फिर… रुद्रप्रताप का बड़ा बेटा 34 वर्ष की उम्र में कुएँ में मृत मिला। अगली पीढ़ी का वारिस… हवेली की छत से गिरा। उसके बाद किसी की मृत्यु आग में हुई। कोई जंगल में मृत मिला। कोई अपने बंद कमरे में। और… अद्विक के पिता वीरेंद्र राजवंशी… अपने 35वें जन्मदिन से केवल चार दिन पहले… हवेली के उसी पुराने कमरे में मृत पाए गए थे। उनकी मृत्यु को आत्महत्या माना गया। तब अद्विक केवल दस वर्ष का था। अब… पच्चीस साल बाद… अद्विक स्वयं 35 वर्ष का होने वाला है। वह पढ़ा-लिखा businessman है। श्राप में विश्वास नहीं करता। वह वर्षों बाद परिवार सहित हवेली इसलिए लौटा है क्योंकि उसकी दादी ने अचानक सभी सदस्यों को बुलाकर घोषणा की है— “इस बार इतिहास दोहराने से पहले हमें 1876 का सच खोलना होगा।” लेकिन उसी रात… हवेली की बंद घंटी बजती है। दीवार पर अद्विक की तस्वीर दिखाई देती है। और अगली सुबह… परिवार का 82 वर्षीय पुराना सेवक मृत मिलता है। मरने से कुछ समय पहले उसने केवल एक वाक्य लिखा था— “श्राप झूठ नहीं है… लेकिन कहानी हमें गलत बताई गई थी।” अब… अद्विक के पास केवल 20 दिन बचे हैं।

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