राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा पर बसा एक छोटा सा गाँव सूरजपुरा अपनी एक अनोखी कहानी के लिए प्रसिद्ध था।
गाँव के बीचों-बीच खड़ा था 300 साल पुराना बरगद का पेड़।
लोग उसे सिर्फ पेड़ नहीं कहते थे।
सबके लिए वह था — बरगद बाबा।
कहा जाता था कि जब भी गाँव पर कोई संकट आने वाला होता, उस पेड़ की पत्तियाँ बिना हवा के हिलने लगती थीं।
बुजुर्गों का मानना था कि कई पीढ़ियों पहले एक संत ने जाते समय उस पेड़ के नीचे एक आखिरी वचन दिया था—
“जब तक इस गाँव के लोग लालच से दूर रहेंगे, यह बरगद उनकी रक्षा करेगा।”
सालों तक गाँव में प्रेम और शांति रही।
लेकिन समय बदला।
नई पीढ़ी ने पुरानी बातों को कहानियाँ समझना शुरू कर दिया।
शहर से पढ़कर लौटा अभिराज चौहान उस जमीन पर एक बड़ा व्यापार शुरू करना चाहता था, जहाँ बरगद बाबा खड़े थे।
उसके लिए वह सिर्फ एक पेड़ था।
लेकिन गाँव की बुजुर्ग गौरी दादी जानती थीं कि बरगद बाबा से जुड़ा एक ऐसा रहस्य है जिसे अगर भुला दिया गया तो पूरा गाँव अपनी सबसे बड़ी विरासत खो देगा।
धीरे-धीरे अभिराज को पुराने किस्सों, लोकगीतों और एक छुपी हुई कहानी से पता चलता है कि बरगद बाबा केवल विश्वास नहीं बल्कि एक अधूरे वचन की निशानी हैं।
क्या नई पीढ़ी पुराने विश्वास को समझ पाएगी?
या लालच के आगे सदियों पुरानी लोककथा खत्म हो जाएगी?
All Chapters
- अध्याय 1: सूरजपुरा की चौपाल और बरगद बाबा की पहली पुकार
- अध्याय 2: अभिराज की वापसी और लालच की पहली छाया
- अध्याय 3: गौरी दादी की लोककथाएँ और पुरानी पीढ़ी का संदेश
- अध्याय 4: बरगद के नीचे छिपा अधूरा वचन
- अध्याय 5: प्रकृति का विरोध और गाँव की उथल-पुथल
- अध्याय 6: अभिराज की आँखों में जड़ों का आना
- अध्याय 7: संकट की घड़ी और बरगद बाबा का अंतिम संकेत
- अध्याय 8: आखिरी वचन का साक्षात्कार और गाँव की नई शुरुआत
