प्रतिष्ठित व्यवसायी देवेंद्र त्रिपाठी की अचानक मृत्यु के बाद पूरा परिवार तेरहवीं के लिए पुश्तैनी घर में इकट्ठा होता है। उसी शाम उनकी वसीयत के साथ एक सीलबंद लिफाफा खोला जाता है। अंदर केवल एक पन्ना है, जिस पर देवेंद्र ने लिखा है—“मेरी मौत के बाद अगर इस परिवार को किसी एक इंसान को दोष देना हो, तो पहले आदित्य से पूछना कि उसने उस रात मुझे मरने क्यों दिया।” आदित्य उनका बड़ा बेटा है। पूरा परिवार उसकी ओर देखने लगता है। आदित्य केवल इतना कहता है—“हाँ, उस रात मैं पापा के पास था। लेकिन आप लोग जिस बात की अदालत लगाने वाले हैं, उसमें गवाही देने से पहले अपने-अपने सच भी बता दीजिएगा।”
All Chapters
- अध्याय 1 – अपनों की अदालत
- अध्याय 2 – उस रात तुम कहाँ थे?
- अध्याय 3 – एम्बुलेंस देर से क्यों आई?
- अध्याय 4 – पापा ने तुम्हें ही क्यों बुलाया?
- अध्याय 5 – रोहन के खाते में लाखों रुपये
- अध्याय 6 – बुआ लालची नहीं थीं
- अध्याय 7 – माँ भी जाना चाहती थीं
- अध्याय 8 – उस रात पापा होश में थे
- अध्याय 9 – तुमने फिर भी देर की
- अध्याय 10 – चिट्ठी पूरी पढ़ो
- अध्याय 11 – मेरी भी अदालत लगाना
- अध्याय 12 – फैसला
