अपनों की अदालत

अपनों की अदालत
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प्रतिष्ठित व्यवसायी देवेंद्र त्रिपाठी की अचानक मृत्यु के बाद पूरा परिवार तेरहवीं के लिए पुश्तैनी घर में इकट्ठा होता है। उसी शाम उनकी वसीयत के साथ एक सीलबंद लिफाफा खोला जाता है। अंदर केवल एक पन्ना है, जिस पर देवेंद्र ने लिखा है—“मेरी मौत के बाद अगर इस परिवार को किसी एक इंसान को दोष देना हो, तो पहले आदित्य से पूछना कि उसने उस रात मुझे मरने क्यों दिया।” आदित्य उनका बड़ा बेटा है। पूरा परिवार उसकी ओर देखने लगता है। आदित्य केवल इतना कहता है—“हाँ, उस रात मैं पापा के पास था। लेकिन आप लोग जिस बात की अदालत लगाने वाले हैं, उसमें गवाही देने से पहले अपने-अपने सच भी बता दीजिएगा।”

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