कभी-कभी सबसे बड़ा गवाह वह नहीं होता जो सबके सामने बयान देता है…
बल्कि वह होता है जो सब कुछ देखकर भी वर्षों तक चुप रहता है।
मध्य प्रदेश के पहाड़ी कस्बे रुद्रकोट में स्थित प्राचीन नीलकंठ मंदिर अपनी मान्यताओं से अधिक एक अनसुलझी घटना के लिए जाना जाता था।
अठारह वर्ष पहले मंदिर के वार्षिक उत्सव की रात एक प्रतिष्ठित परिवार की युवती अचानक गायब हो गई थी।
मंदिर के पीछे खून के निशान मिले।
नदी किनारे उसका टूटा हुआ कंगन मिला।
लेकिन न उसका शव मिला और न अपराधी।
पुलिस ने मामला अधूरे सबूतों के कारण बंद कर दिया।
उस रात मंदिर के बूढ़े पुजारी आचार्य वेदांश शास्त्री वहाँ मौजूद थे।
लोगों का विश्वास था कि उन्होंने सब कुछ अपनी आँखों से देखा था।
लेकिन हर बार पूछे जाने पर वह केवल इतना कहते—
“कुछ सच बोलने से न्याय नहीं मिलता… कई और जिंदगियाँ खत्म हो जाती हैं।”
वर्षों बाद खोजी पत्रकार तविशा पंत उस पुराने मामले की जाँच करने रुद्रकोट पहुँचती है। उसे महसूस होता है कि पुजारी की चुप्पी केवल डर नहीं, बल्कि अपराधबोध और किसी पुराने वचन का बोझ भी है।
आचार्य वेदांश हर प्रश्न पर घबरा जाते हैं।
रात होते ही मंदिर का एक हिस्सा बंद कर देते हैं।
और उस पत्थर की सीढ़ी के पास किसी को नहीं जाने देते जहाँ युवती को आखिरी बार देखा गया था।
धीरे-धीरे तविशा को पता चलता है कि उस रात केवल एक युवती गायब नहीं हुई थी…
बल्कि गाँव की सत्ता, एक प्रतिष्ठित परिवार और मंदिर से जुड़ी वर्षों पुरानी साजिश भी उसी अंधेरे में दफन कर दी गई थी।
पुजारी ने आखिर क्या देखा था?
वह किससे डरता है?
क्या उसकी चुप्पी किसी निर्दोष को बचा रही है…
या असली अपराधी को?
All Chapters
- अध्याय 1: चुप्पी का प्राचीन बोझ
- अध्याय 2: टूटे कंगन की गूँज
- अध्याय 3: मंदिर की बंद सीढ़ियाँ
- अध्याय 4: रक्त और आस्था का संगम
- अध्याय 5: पुजारी की आँखों में छिपा सच
- अध्याय 6: गुमशुदा रात का साया
- अध्याय 7: परिवार की काली परछाईं
- अध्याय 8: डायरी में दफन अपराधबोध
- अध्याय 9: न्याय बनाम वचन की जंग
- अध्याय 10: खामोश गवाह का अंतिम मौन
