सच्ची आस्था

सच्ची आस्था
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भगवान के दरबार में…
क्या सचमुच सब बराबर होते हैं?
या वहाँ भी अमीरों की लाइन अलग होती है?

वाराणसी के प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर के बाहर रोज़ की तरह लंबी कतार लगी थी।
महँगे कपड़ों में आए लोग…
बड़ी-बड़ी गाड़ियों से उतरते श्रद्धालु…
और उसी भीड़ के एक कोने में खड़ा था गोकुल।
एक गरीब रिक्शा चालक।
उसकी जेब में सिर्फ़ ₹21 थे।

वह अपनी बीमार माँ के लिए भगवान से दुआ माँगने आया था।
लेकिन मंदिर के बाहर खड़े कुछ लोगों ने उसे देखकर कहा—
“पहले बड़े दान देने वाले जाएँगे… तुम बाद में आना।”
गोकुल बिना कुछ बोले पीछे हट गया।
उसकी आँखों में आँसू थे…
लेकिन भगवान से शिकायत नहीं थी।
बस एक सवाल था—
“क्या भगवान अमीर-गरीब देखते हैं?”

उसी दिन मंदिर में शहर के सबसे बड़े उद्योगपति रुद्रांश सिंघानिया भी करोड़ों का दान लेकर पहुँचे।
भीड़ उनके स्वागत में खड़ी हो गई।
लेकिन उसी रात…
एक ऐसी घटना हुई जिसने पूरे शहर की सोच बदल दी।

एक साधारण रिक्शा चालक…
एक अमीर उद्योगपति…
एक बुज़ुर्ग साधु…
और भगवान के दरबार में छुपा ऐसा सच…
जिसने सबको यह सोचने पर मजबूर कर दिया—
भगवान तक पहुँचने का रास्ता जेब से जाता है…
या दिल से?

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