बेगुनाह इंस्पेक्टर की आख़िरी गुहार

बेगुनाह इंस्पेक्टर की आख़िरी गुहार
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हर अपराधी…
खुद को बेगुनाह कहता है।

लेकिन इस बार…
एक बेगुनाह इंस्पेक्टर को अपराधी बना दिया गया।

उत्तर प्रदेश के शहर प्रयागराज में ईमानदार पुलिस अधिकारी इंस्पेक्टर आदित्य शेखावत अपनी निष्पक्ष जांच और बेखौफ ईमानदारी के लिए जाना जाता था।
उसने कई बड़े अपराधियों को सलाखों के पीछे पहुँचाया था।
लेकिन एक दिन…
एक प्रभावशाली उद्योगपति की हत्या हो जाती है।
मौके पर मिले सबूत…
सीसीटीवी फुटेज…
मोबाइल रिकॉर्ड…
और गवाह…
सब सीधे इंस्पेक्टर आदित्य की ओर इशारा करते हैं।

पूरा देश उसे हत्यारा मान लेता है।
पुलिस विभाग उसे निलंबित कर देता है।
अदालत में मुकदमा शुरू हो जाता है।
यहाँ तक कि उसके अपने साथी भी उससे दूरी बना लेते हैं।
लेकिन अदालत में सजा सुनाए जाने से ठीक पहले…
आदित्य सिर्फ एक वाक्य कहता है—
“अगर मैं मर भी गया… तो मेरी आख़िरी गुहार सिर्फ इतनी है… असली हत्यारे को ढूँढ लेना।”

उसकी यह बात एक युवा खोजी पत्रकार काव्या त्रिपाठी के दिल में सवाल पैदा कर देती है।
वह दोबारा पूरे केस की जांच शुरू करती है।
जैसे-जैसे सच सामने आता है…
वैसे-वैसे पता चलता है कि यह सिर्फ एक हत्या नहीं…
बल्कि सत्ता, भ्रष्टाचार और विश्वासघात की ऐसी साजिश थी जिसमें एक बेगुनाह इंस्पेक्टर को बलि का बकरा बनाया गया।

अब सवाल था—
क्या आदित्य अपनी बेगुनाही साबित कर पाएगा?
क्या अदालत तक असली सच पहुँच पाएगा?
या उसकी आख़िरी गुहार हमेशा अधूरी रह जाएगी?

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