शहर से लगभग दस किलोमीटर दूर…
घने जंगलों के बीच…
एक टूटा हुआ पुल था…
जिसे लोग वर्षों से “पुराना पुल” कहते थे।
दिन में…
वह सिर्फ़ जर्जर पत्थरों और जंग लगे लोहे का ढांचा दिखाई देता था।
लेकिन…
हर रात ठीक 12 बजे…
वह अजीब रोशनी से चमक उठता।
लोग कहते थे…
जो भी उस पुल पर गया…
वह कभी पहले जैसा वापस नहीं लौटा।
कुछ लौटे ही नहीं…
और जो लौटे…
उन्होंने उस रात के बारे में कभी कुछ नहीं बताया।
युवा पत्रकार राजकुमारी सिंह इन कहानियों पर कभी विश्वास नहीं करती थी।
लेकिन एक रात…
उसे बार-बार एक ही सपना आने लगा।
टूटा हुआ पुल…
घना कोहरा…
और एक आवाज़—
“सच से मत भागो…”
उसके बाद उसकी ज़िंदगी बदलने लगी।
पुरानी तस्वीरें…
भूली हुई यादें…
और बचपन की एक ऐसी घटना…
जिसे उसने वर्षों पहले अपने मन से मिटा दिया था…
धीरे-धीरे लौटने लगी।
लेकिन…
क्या पुल सचमुच कोई रहस्य छिपाए हुए था…
या वह उसके अपने अपराधबोध का आईना था?
