मिट्टी की पंचायत

मिट्टी की पंचायत
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कहते हैं…
शहर इंसान को काम करना सिखाता है…
लेकिन गाँव उसे इंसान बनना सिखाता है।

दिल्ली में नौकरी न मिलने के बाद अर्णव मिश्रा को मजबूरी में राजस्थान के छोटे से गाँव भीमपुरा की ग्राम पंचायत में विकास अधिकारी की नौकरी स्वीकार करनी पड़ती है।
उसे लगता है कि यह सिर्फ कुछ महीनों की बात है।
लेकिन भीमपुरा वैसा गाँव नहीं था जैसा उसने फिल्मों में देखा था।
यहाँ हर पेड़ की अपनी कहानी थी।
हर चाय की दुकान पर एक नई बहस होती थी।
हर पंचायत की बैठक में कोई न कोई ऐसा फैसला होता था जो पूरे गाँव की जिंदगी बदल देता था।
और सबसे बड़ी बात…
यहाँ लोग गरीब हो सकते थे…
लेकिन दिल से बेहद अमीर थे।

धीरे-धीरे अर्णव समझने लगता है कि सड़क, पानी और बिजली से भी बड़ी चीज़ होती है…
विश्वास।
अब उसकी असली नौकरी सरकारी फाइलें भरना नहीं…
बल्कि टूटे रिश्तों को जोड़ना, लोगों का भरोसा जीतना और गाँव की सोच बदलना थी।

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