पुरानी दिल्ली की…
एक शांत कॉलोनी।
जहाँ…
हर कोई…
हर किसी को जानता था।
कौन कब घर आता है…
किसके घर कौन मेहमान आया…
किसकी किससे लड़ाई हुई…
सबकी खबर…
पूरे मोहल्ले को रहती थी।
फिर…
एक दिन…
गली के आख़िरी मकान में…
एक नया पड़ोसी रहने आया।
नाम…
विराज अरोड़ा।
वह…
कभी किसी से ज़्यादा बात नहीं करता था।
न किसी के घर जाता…
न किसी को अपने घर बुलाता।
लेकिन…
अजीब बात यह थी…
उसे…
हर घर का…
हर राज़ पता था।
एक दिन…
उसने एक महिला से कहा—
“आज शाम अपने बेटे को छत पर मत जाने देना…”
महिला हँस दी।
लेकिन…
उसी शाम…
छत का पुराना हिस्सा टूट गया।
उस दिन के बाद…
मोहल्ले में डर फैल गया।
विराज…
आख़िर था कौन?
कोई जासूस?
कोई अपराधी?
या…
वह किसी ऐसे सच की तलाश में था…
जो पूरे मोहल्ले की नींव हिला सकता था?
