वसीयत का सच

वसीयत का सच
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दादा…
ठाकुर हरिदेव सिंह…
पूरे गाँव की सबसे सम्मानित शख्सियत थे।
उनकी हवेली…
सिर्फ़ एक घर नहीं…
बल्कि…
पूरे परिवार की पहचान थी।

उनके निधन के बाद…
पूरा परिवार…
वसीयत सुनने के लिए…
हवेली के दीवानखाने में इकट्ठा हुआ।
सबको भरोसा था…
कि हवेली…
बड़े बेटे…
या फिर…
पूरे परिवार के नाम होगी।

लेकिन…
वकील ने…
जैसे ही आख़िरी पन्ना पढ़ा…
कमरे में…
ऐसी खामोशी छा गई…
जिसने…
सालों से बने रिश्तों को हिला दिया।
वसीयत में लिखा था—
“यह हवेली मेरे परिवार की नहीं… उस इंसान की है जिसने मेरा सबसे बड़ा सच अपने सीने में दफन रखा।”
और…
उसके बाद…
जिस नाम का ऐलान हुआ…
उसे सुनकर…
हर चेहरा…
सफेद पड़ गया।

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