भोपाल की पुरानी गलियों में रहने वाला आर्यमान अवस्थी एक साधारण युवक था, जिसका सपना सिर्फ़ एक किताब लिखना था। लेकिन बार-बार प्रकाशकों की अस्वीकृति, घर की आर्थिक परेशानियाँ और टूटता हुआ आत्मविश्वास उसे लेखन छोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इसी बीच दादाजी की छोड़ी हुई एक पुरानी डायरी और एक फाउंटेन पेन उसकी ज़िंदगी बदल देते हैं। धीरे-धीरे उसे एहसास होता है कि शब्द सिर्फ़ कहानियाँ नहीं, इंसानों की तकदीर भी बदल सकते हैं।
