मुंबई का…
125 वर्ष पुराना…
विक्टोरिया टर्मिनस का एक बंद प्लेटफ़ॉर्म…
जिसे वर्षों पहले…
सार्वजनिक उपयोग से हटा दिया गया था।
लेकिन…
उस प्लेटफ़ॉर्म का…
एक पुराना टिकट काउंटर…
हर रात…
अपने आप…
सक्रिय हो जाता।
सुबह…
रेलवे कर्मचारी…
वहाँ…
एक नया टिकट पाते…
और…
कुछ घंटों बाद…
उसी नाम का व्यक्ति…
रहस्यमय परिस्थितियों में…
मृत मिल जाता।
जब…
देश के प्रसिद्ध न्यायाधीश का नाम…
उसी टिकट पर छपता है…
तो…
जांच की जिम्मेदारी मिलती है…
डीसीपी अथर्व राठौड़ को।
उनके साथ…
रेलवे सुरक्षा विशेषज्ञ ईरा नाइक…
और…
डिजिटल फॉरेंसिक अधिकारी डॉ. युविका शर्मा…
इस रहस्य की तह तक पहुँचते हैं।
लेकिन…
जैसे-जैसे…
वे रेलवे के…
पुराने सर्वर…
और…
30 वर्ष पुराने रिकॉर्ड खंगालते हैं…
उन्हें एहसास होता है…
कि…
टिकट…
मौत की भविष्यवाणी नहीं करता…
बल्कि…
हत्या की अगली सूची छापता है।
