रक्त रिवाज़

रक्त रिवाज़
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काल्पनिक महानगर रंगपुरा में रहने वाला 39 वर्षीय चित्रकार अर्णिक वर्मा देश के सबसे महँगे contemporary artists में गिना जाता था। दस वर्ष पहले उसे कोई नहीं जानता था। छोटी galleries, कम बिक्री, कर्ज, अस्वीकृत प्रदर्शनियाँ और लगातार यह डर कि शायद उसकी कला कभी किसी के लिए मायने नहीं रखेगी। फिर उसकी जिंदगी में आया प्रभावशाली art patron समरवेश सूद। समरवेश ने उसकी पहली बड़ी exhibition finance की, collectors लाए, international galleries के दरवाज़े खोले। कुछ ही वर्षों में अर्णिक की paintings करोड़ों में बिकने लगीं। अर्णिक ने इसे अपनी मेहनत और प्रतिभा का परिणाम माना।
फिर उसकी career की दसवीं वर्षगाँठ पर खोजी पत्रकार यामिनी रज़ा उससे मिलने आती है। वह उसके सामने बारह अखबारों की कतरनें रखती है—बारह मृत लोग, बारह अलग शहर, बारह अलग backgrounds। पहली नज़र में उनमें कोई संबंध नहीं। फिर यामिनी एक और सूची निकालती है—अर्णिक की पिछले बारह महीनों की सबसे महँगी paintings। हर बिक्री किसी एक मौत से 24 घंटे के भीतर हुई थी। अर्णिक इसे संयोग कहता है। यामिनी उसकी सबसे प्रसिद्ध painting “लाल मौन” की तस्वीर खोलती है, फिर पहले मृतक की crime-scene photograph में दिखाई देने वाला एक छोटा प्रतीक दिखाती है। दोनों में एक ही चिन्ह है। यामिनी पूछती है—“आपकी कला की कीमत कौन चुका रहा है, अर्णिक?”
तीन दिन बाद यामिनी गायब हो जाती है। और अर्णिक के studio के शीशे पर लाल रंग से केवल दो शब्द लिखे मिलते हैं—“तेरहवाँ रिवाज़।”
मामले की जांच डीसीपी इरावती देशमुख को मिलती है। उनके साथ Art-Fraud investigator वेदिका राय, forensic provenance expert डॉ. नीलाक्ष सेन और behavioral psychologist डॉ. महिरा कौल उस नेटवर्क की जांच शुरू करते हैं जिसने कला, प्रतिष्ठा और मृत्यु को एक ही बाजार में बदल दिया है। लेकिन जांच आगे बढ़ने पर एक और भयावह सच सामने आता है—अर्णिक पूरी तरह निर्दोष नहीं है। दस वर्ष पहले उसे पहली मौत के बारे में कुछ पता चला था। उसने सवाल पूछे थे। फिर उसकी पहली painting करोड़ों में बिक गई। और उसने दोबारा कभी वह सवाल नहीं पूछा।

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