लखनऊ के पुराने इलाके में स्थित शब्दांश भवन कभी प्रसिद्ध लेखक और संपादक वाचस्पति मेहरोत्रा का घर था।
वाचस्पति मानते थे—
“शब्द तलवार से गहरा घाव भी दे सकते हैं…
और उसी घाव को भर भी सकते हैं।”
उनकी मृत्यु के बाद…
परिवार के सभी सदस्य वर्षों बाद उस घर में इकट्ठा हुए।
कारण था उनकी अंतिम वसीयत।
वसीयत में संपत्ति का बँटवारा नहीं लिखा था।
उसमें केवल एक निर्देश था—
“बारह रातें इस घर में साथ बिताओ।
उसके बाद ही मेरा अंतिम पत्र खोला जाए।”
परिवार ने इसे एक भावुक अंतिम इच्छा समझा।
लेकिन पहली रात…
बैठक कक्ष की दीवार पर एक वाक्य उभरा—
“अद्वय ने घर नहीं छोड़ा था…
उसे जाने पर मजबूर किया गया था।”
अद्वय…
परिवार का बड़ा बेटा…
जो अठारह वर्ष पहले बिना कोई कारण बताए घर छोड़कर चला गया था।
दूसरी रात…
माँ के कमरे में लिखा मिला—
“तुमने उसका पत्र पढ़ा था…
फिर भी सबके सामने कहा कि कोई पत्र आया ही नहीं।”
तीसरी रात…
परिवार के पुराने चिकित्सक की संदिग्ध मृत्यु हो गई।
उनकी जेब से…
दीवार पर उभरे वाक्यों जैसी लिखावट वाला…
एक फटा हुआ नोट मिला।
मामले की जांच एसीपी काश्यपी राव को सौंपी जाती है।
उनके साथ दस्तावेज़ एवं रासायनिक लेखन विशेषज्ञ डॉ. ऋजुला सेन, पारिवारिक मनोवैज्ञानिक डॉ. अनुग्रह सूद और स्थापत्य संरचना विशेषज्ञ व्योमेश परांजपे घर की दीवारों, पुराने पत्रों और टूटे हुए रिश्तों की जांच शुरू करते हैं।
लेकिन…
जैसे-जैसे नोट उभरते हैं…
उन्हें पता चलता है कि परिवार के हर सदस्य ने…
किसी न किसी दिन…
एक ऐसा शब्द कहा था…
या कोई आवश्यक शब्द कहने से बचा था…
जिसने किसी दूसरे की पूरी ज़िंदगी बदल दी।
All Chapters
- अध्याय 1 – पहला उभरता नोट
- अध्याय 2 – दीवार पर लिखा नाम
- अध्याय 3 – अद्वय का आख़िरी पत्र
- अध्याय 4 – रिश्ते का पहला झूठ
- अध्याय 5 – मिटाए गए शब्द
- अध्याय 6 – बंद दीवार के पीछे
- अध्याय 7 – पछतावे की लिखावट
- अध्याय 8 – परिवार के खिलाफ शब्द
- अध्याय 9 – दो अलग स्याहियाँ
- अध्याय 10 – उस रात की बातचीत
- अध्याय 11 – आख़िरी अधूरा वाक्य
- अध्याय 12 – टूटे हुए नोट्स
