28 वर्षीय अन्वी शर्मा अपने परिवार की आर्थिक और भावनात्मक रीढ़ है। पिता की तबीयत, भाई की पढ़ाई और बहन की शादी—सब कुछ बिना कहे उसी पर टिका है। जब विहान मल्होत्रा उसके जीवन में आता है और पहली बार उसे खुद होने की आज़ादी महसूस होती है, दोनों शादी का फैसला करते हैं। तब अन्वी की अपनी जिंदगी परिवार की जरूरतों से टकराती है। परिवार उसे स्वार्थ से नहीं, डर से रोकना चाहता है—क्योंकि उसके पुणे चले जाने से घर की पूरी व्यवस्था बदल सकती है। विहान भी उसे परिवार से तोड़कर नहीं पाना चाहता। अब सवाल सिर्फ प्यार या परिवार का नहीं, बल्कि यह है कि जिम्मेदारी कहाँ खत्म होती है और आत्म-त्याग कहाँ शुरू।
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- अध्याय 1 – एक बात कहनी है
- अध्याय 2 – हमारे बाद कौन?
- अध्याय 3 – मेरी जिंदगी कब?
- अध्याय 4 – ये घर तुमसे चलता है
- अध्याय 5 – जिम्मेदारी किसकी है?
- अध्याय 6 – प्यार की भी जिम्मेदारी होती है
- अध्याय 7 – अगर मैं ना कह दूँ?
- अध्याय 8 – जो हमने मान लिया था
- अध्याय 9 – बेटी या सहारा
- अध्याय 10 – कोई एक क्यों चुने?
- अध्याय 11 – इस घर को चलना सीखना होगा
- अध्याय 12 – प्यार भी, परिवार भी
