पिता की मृत्यु के बाद तैंतीस वर्षीय कबीर त्रिपाठी पंद्रह साल बाद अपने पुश्तैनी गाँव देवगढ़ लौटता है। पितृपक्ष की पहली रात उसे पता चलता है कि उसके परिवार में हर वर्ष एक विशेष श्राद्ध किया जाता है, लेकिन पूजा के बीच एक पिंड हमेशा बिना नाम के अलग रखा जाता है। दादी उसे छूने से मना करती हैं। उसी रात कबीर आँगन में गीले पैरों के निशान देखता है जो तुलसी के पास से शुरू होकर पूजा-घर तक जाते हैं—लेकिन वापस नहीं आते। अगले दिन पुराने संदूक से उसे अपने बचपन की लिखावट में एक पर्ची मिलती है—“इस बार उसका श्राद्ध पूरा करना। पिछली बार हमने गलत नाम लिया था।”
All Chapters
- अध्याय 1 – बिना नाम का पिंड
- अध्याय 2 – मेरा नाम लो
- अध्याय 3 – गौरी माँ कौन थी?
- अध्याय 4 – इस घर में पाँचवाँ नाम था
- अध्याय 5 – जिसका श्राद्ध हम करते रहे
- अध्याय 6 – नदी वाली रात
- अध्याय 7 – पिता ने क्या छिपाया था?
- अध्याय 8 – गलत नाम का श्राद्ध
- अध्याय 9 – मुझे गौरी याद आने लगी है
- अध्याय 10 – उस रात नदी में कौन मरा था?
- अध्याय 11 – गौरी का श्राद्ध कभी हुआ ही नहीं
- अध्याय 12 – अधूरा श्राद्ध
