अधूरा श्राद्ध

अधूरा श्राद्ध
Text size
👁 5,436 views
पिता की मृत्यु के बाद तैंतीस वर्षीय कबीर त्रिपाठी पंद्रह साल बाद अपने पुश्तैनी गाँव देवगढ़ लौटता है। पितृपक्ष की पहली रात उसे पता चलता है कि उसके परिवार में हर वर्ष एक विशेष श्राद्ध किया जाता है, लेकिन पूजा के बीच एक पिंड हमेशा बिना नाम के अलग रखा जाता है। दादी उसे छूने से मना करती हैं। उसी रात कबीर आँगन में गीले पैरों के निशान देखता है जो तुलसी के पास से शुरू होकर पूजा-घर तक जाते हैं—लेकिन वापस नहीं आते। अगले दिन पुराने संदूक से उसे अपने बचपन की लिखावट में एक पर्ची मिलती है—“इस बार उसका श्राद्ध पूरा करना। पिछली बार हमने गलत नाम लिया था।”

All Chapters

Leave a Reply

Scroll to Top