उत्तर प्रदेश के छोटे से कस्बे प्रतापगढ़ में रहने वाला अर्जुन मिश्रा बचपन से लेखक बनना चाहता था।
लेकिन…
घर की गरीबी…
बीमार पिता…
और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी ने…
उसके सपनों को रोज़-रोज़ मजदूरी करने पर मजबूर कर दिया।
दिनभर…
वह मशीनों के शोर में…
दूसरों की किताबें छापता था।
और…
रात को…
एक छोटे से कमरे में…
अपनी कहानियाँ लिखता था।
उसे नहीं पता था…
कि उसकी कलम…
एक दिन…
उसी समाज का आईना बन जाएगी…
जिसने उसे कभी लेखक माना ही नहीं।
