मालवा की आख़िरी रसोई

मालवा की आख़िरी रसोई
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उज्जैन के पास देवलखेड़ा नाम का एक छोटा गाँव… जहाँ राठौर परिवार की विशाल हवेली आज भी मौन खड़ी थी। हवेली की सबसे पुरानी रसोई चार दशकों से ताले में बंद थी। हर साल एक ही तारीख़ पर रसोई के अंदर से बर्तनों की आवाज़, मसालों की खुशबू और चूल्हे के जलने की महक महसूस होती।

जब हवेली का वर्तमान उत्तराधिकारी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाया जाता है, तो जांच की जिम्मेदारी मिलती है एसीपी आर्यमान चौधरी को। उनके साथ खाद्य इतिहास विशेषज्ञ ईरा जोशी और फॉरेंसिक अधिकारी डॉ. वामिका त्रिवेदी इस रहस्य की तह तक पहुँचते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे रसोई के इतिहास को समझते हैं, उन्हें एहसास होता है कि सबसे खतरनाक ज़हर भोजन में नहीं, बल्कि लालच में मिला था।

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