उज्जैन के पास देवलखेड़ा नाम का एक छोटा गाँव… जहाँ राठौर परिवार की विशाल हवेली आज भी मौन खड़ी थी। हवेली की सबसे पुरानी रसोई चार दशकों से ताले में बंद थी। हर साल एक ही तारीख़ पर रसोई के अंदर से बर्तनों की आवाज़, मसालों की खुशबू और चूल्हे के जलने की महक महसूस होती।
जब हवेली का वर्तमान उत्तराधिकारी रहस्यमय परिस्थितियों में मृत पाया जाता है, तो जांच की जिम्मेदारी मिलती है एसीपी आर्यमान चौधरी को। उनके साथ खाद्य इतिहास विशेषज्ञ ईरा जोशी और फॉरेंसिक अधिकारी डॉ. वामिका त्रिवेदी इस रहस्य की तह तक पहुँचते हैं। लेकिन जैसे-जैसे वे रसोई के इतिहास को समझते हैं, उन्हें एहसास होता है कि सबसे खतरनाक ज़हर भोजन में नहीं, बल्कि लालच में मिला था।
All Chapters
- अध्याय 1 — बंद रसोई
- अध्याय 2 — आधी रात की खुशबू
- अध्याय 3 — पुरानी रेसिपी
- अध्याय 4 — ज़हर का पहला सुराग
- अध्याय 5 — हवेली का तहखाना
- अध्याय 6 — विरासत का झूठ
- अध्याय 7 — खोई हुई डायरी
- अध्याय 8 — रहस्यमयी रसोइया
- अध्याय 9 — परिवार का गुनाह
- अध्याय 10 — चालीस साल पुराना सच
- अध्याय 11 — आख़िरी पकवान
- अध्याय 12 — मालवा की आख़िरी रसोई
