यह कथा एक ऐसी नदी के किनारे बसे एक छोटे से गांव की है, जहां जीवन नदी की लय में बंधा हुआ था। सरिता नगर के निवासी, अपनी मिट्टी, अपनी फसलों और अपनी सांस्कृतिक धरोहर के साथ सदियों से सामंजस्य में जीते आए थे। नदी उनके लिए केवल जल का स्रोत नहीं, अपितु माता तुल्य थी—जो उन्हें पोषित करती, उनकी पहचान को संजोती और उनके त्योहारों को अर्थ प्रदान करती थी।
किंतु विकास के नाम पर एक विशाल बांध-निर्माण परियोजना ने इस शांत जीवन को चुनौती दी। बांध, जो बिजली, सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण का वादा लेकर आया, वास्तव में हजारों परिवारों के लिए विस्थापन, विनाश और अनिश्चितता का कारण बन गया। यह कहानी रामलाल, सरला, विजय और अजय जैसे साधारण मनुष्यों के संघर्ष, विरोध, हार और अंततः नई शुरुआत की है।
यह केवल एक गांव की कहानी नहीं है; यह उन असंख्य भारतीय परिवारों की साझा पीड़ा का प्रतिनिधित्व करती है, जिन्हें बड़े बांधों के निर्माण में अपनी जड़ें उखाड़नी पड़ीं। यह विकास की उस दोहरी प्रकृति को उजागर करती है, जहां एक ओर प्रगति का दावा किया जाता है, तो दूसरी ओर मानवीय लागत को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
इस कथा के माध्यम से पाठक को विचार करने का अवसर मिलेगा कि क्या वास्तविक विकास वह है जो कुछ लोगों के जीवन को नष्ट करके दूसरों को लाभ पहुंचाता है, अथवा वह जो सभी के सम्मानजनक अस्तित्व को सुनिश्चित करता है। नदी की पुकार आज भी गूंजती है—एक चेतावनी के रूप में, और एक आशा के रूप में भी।
