जब मंदिर की घंटियों की आवाज़ ने हवा को भर दिया, तो दुल्हन ने अचानक अपनी मांग में सिंदूर लगाने से पहले हाथ रोका। उसकी आँखों में न डर था, न संकोच—बल्कि एक अजीब सी चमक थी, जैसे वह किसी गहरे राज़ को अपने अंदर समेटे खड़ी हो। अन्विता नाम की यह दुल्हन साधारण नहीं थी। समाज की हर अपेक्षा को चुनौती देने वाली उसकी सोच, उसके अनोखे फैसले और छिपा हुआ अतीत उसे किसी रहस्यमयी किताब की पहली पंक्ति बना देते थे।
शादी का मंडप सज चुका था। कपूर परिवार की बहू बनने जा रही अन्विता ने रस्मों से पहले ही एक शर्त रख दी थी—कोई भी पुरानी रीति-रिवाज उसके व्यक्तिगत सम्मान पर सवाल नहीं उठा सकता। परिवार वाले मुस्कुराए, लेकिन उनकी मुस्कान में असमंजस था। कौन थी यह लड़की, जो शादी के दिन भी अपनी शर्तें रख रही थी? उसका परिवार दिल्ली से आया था, पर उसकी कहानी उज्जैन की गलियों और एक पुराने हवेली के राज़ों से जुड़ी लगती थी।
अन्विता की मुस्कान में एक अनकहा वादा था—वह न केवल एक परिवार में शामिल होने आई थी, बल्कि उसकी जड़ों को हिलाने भी आई थी। जैसे ही फेरे पूरे हुए, एक पुरानी डायरी का पन्ना उसके दुपट्टे से फिसलकर गिरा। उस पर लिखा एक नाम और एक तारीख ने सबको चौंका दिया। क्या था वह राज़ जो इस अनोखी दुल्हन के साथ घर में प्रवेश कर रहा था? क्या उसका अतीत परिवार को तोड़ देगा या नई शुरुआत देगा?
