करवा चौथ की वो अधूरी चाँदनी

करवा चौथ की वो अधूरी चाँदनी
Text size
👁 33,396 views

रात के सन्नाटे में सिर्फ़ एक दीये की लौ जल रही थी।
अंजलि ने खिड़की के पास बैठकर चाँद की ओर देखा। आज करवा चौथ था। पूरे मोहल्ले में महिलाएँ सजी-धजी, सास-ससुर के आशीर्वाद ले रही थीं, माथे पर सिंदूर सजाकर, हाथों में चूड़ियाँ खनकाती हुईं। लेकिन अंजलि के हाथ खाली थे। न कोई चूड़ी, न कोई बिंदी, न कोई उम्मीद।
सिर्फ़ एक पुरानी तस्वीर — दीवार पर टंगी, धूल से धुंधली। उसमें वो मुस्कुरा रहा था। आरव। जिसने सात फेरे नहीं लिए, पर वादा किया था कि “चाँदनी रात में जब भी चाँद निकलेगा, मैं तुम्हारी थाली में होगा।”
वो वादा आज भी उसके सीने में चुभता था।
पाँच साल पहले की वो रात याद आती है, जब आरव ने अचानक सब छोड़कर शहर छोड़ दिया था। कोई ख़त नहीं, कोई फोन नहीं। बस एक अधूरा मैसेज:
“मुझे माफ़ कर देना, अंजलि। ये मेरे बस में नहीं।”
क्यों? क्या गलती थी उसकी? या सच में कोई राज़ था जो आरव कभी नहीं बता सका?
अंजलि की सास, शैलजा जी, आज भी हर करवा चौथ पर यही कहती हैं —
“बेटी, जिसका नाम तक नहीं लिया जा सकता, उसके लिए उपवास मत रखा कर। वो कभी लौटकर नहीं आएगा।”
पर अंजलि का दिल मानता नहीं।
आज फिर वही चाँद निकला है। अधूरा, टेढ़ा, जैसे कुछ कहना चाहता हो।
तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई।
धीमी, लेकिन तेज़। जैसे कोई डर रहा हो, पर रुक भी नहीं पा रहा हो।
अंजलि ने साड़ी का पल्लू संभाला और दरवाज़ा खोला।
सामने खड़ा था वो।
आरव।
वही चेहरा, वही आँखें। पर अब उन आँखों में डर था, पछतावा था… और कुछ ऐसा जो अंजलि ने पहले कभी नहीं देखा।
“अंजलि…” उसकी आवाज़ काँप रही थी। “मुझे सिर्फ़ पाँच मिनट चाहिए। उसके बाद मैं चला जाऊँगा… हमेशा के लिए।”
अंजलि के हाथ में थाली काँप गई।
चाँदनी ठीक उसके पीछे चमक रही थी।
पर सवाल वही था —
क्या वो सच बोल रहा था… या ये सिर्फ़ एक और झूठ की शुरुआत थी?

All Chapters

Leave a Reply

Scroll to Top