एक छोटे से कस्बे में मेले के दौरान एक बहुरूपिया आता है, जो हर दिन नया चेहरा, नई आवाज़ और नई पहचान लेकर लोगों के सामने खड़ा हो जाता है। लोग उसे कलाकार समझकर तालियाँ बजाते हैं, लेकिन जल्द ही कस्बे में अजीब घटनाएँ शुरू हो जाती हैं।
कभी कोई पुराना राज़ सामने आता है, कभी कोई अमीर व्यापारी अचानक गायब हो जाता है, तो कभी किसी के घर में ऐसा सबूत मिल जाता है जो वर्षों पुराने अपराध की ओर इशारा करता है। हर घटना के बाद किसी न किसी ने बहुरूपिये को आसपास देखा होता है, लेकिन कोई यह नहीं बता पाता कि उसका असली चेहरा कैसा है।
क्या वह सिर्फ एक कलाकार है? या बदला लेने आया कोई छिपा हुआ शख्स? या फिर वह हर उस चेहरे का आईना है, जिसे समाज ने सालों से दबा रखा था?
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- अध्याय 1: मेले में आया अजनबी
- अध्याय 2: पहला चेहरा
- अध्याय 3: मुखौटे के पीछे
- अध्याय 4: गायब व्यापारी
- अध्याय 5: पुरानी हवेली का सच
- अध्याय 6: मंदिर वाली रात
- अध्याय 7: जिसने उसे पहचाना
- अध्याय 8: झूठी गवाही
- अध्याय 9: बहुरूपिया या भूत?
- अध्याय 10: बंद संदूक
- अध्याय 11: गाँव का काला इतिहास
- अध्याय 12: पुलिस की चाल
- अध्याय 13: नकली चेहरा, असली दर्द
- अध्याय 14: बचपन की चीख
- अध्याय 15: एक और रूप
- अध्याय 16: सबसे बड़ा शक
- अध्याय 17: सच के करीब
- अध्याय 18: आखिरी अभिनय
- अध्याय 19: असली चेहरा
- अध्याय 20: कौन था बहुरूपिया?
