वर्षों बाद अपने पुश्तैनी गाँव देवखेड़ा लौटे सिविल इंजीनियर अभय सिंह को पता चलता है कि गाँव के बाहर तीस साल से बंद “मौत का कुआँ” की जाली फिर खुल गई है। उसी रात चौदह वर्षीय सोनू गायब होता है और तीन दिन बाद बिना चोट, भूख या प्यास के घर लौट आता है—लेकिन उसके मुँह से तीस साल पहले दबे मज़दूरों की यादें और काम की बारीकियाँ निकलने लगती हैं। जैसे-जैसे झूठी मृत्यु-सूची, पिता विक्रम की अधूरी डायरी और कुएँ के नीचे गिरी पुरानी बावड़ी सामने आती है, अभय को समझ आता है कि कुआँ आत्माएँ नहीं रखता; वह उस सामूहिक अपराध की अधूरी स्मृतियाँ रखता है जब गाँव ने नीचे से आती पुकारें सुनकर भी जाली बंद कर दी थी।
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- अध्याय 1 – जाली खुली थी
- अध्याय 2 – जो वापस आया
- अध्याय 3 – कुएँ के नाम
- अध्याय 4 – पिता की आवाज़
- अध्याय 5 – उस रात कितने लोग थे?
- अध्याय 6 – नीचे कोई रास्ता है
- अध्याय 7 – सोनू किसकी बातें कर रहा है?
- अध्याय 8 – गाँव ने क्या सुना था?
- अध्याय 9 – मौत का कुआँ कैसे बना
- अध्याय 10 – जो नीचे रह गए
- अध्याय 11 – आखिरी आवाज़
- अध्याय 12 – कुआँ बंद नहीं हुआ
