ऑफिस का राज

ऑफिस का राज
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नवंबर की ठंडी शाम को, जब पूरा ऑफिस खाली हो चुका था, अनन्या मेहरा ने अपनी डेस्क पर पड़ी एक पुरानी USB ड्राइव देखी। उस पर सिर्फ एक शब्द लिखा था — “प्रोजेक्ट वासुदेव”।

चमकदार ग्लास वाली इमारत में, जहां हर कोई अपनी महत्वाकांक्षा की सीढ़ियां चढ़ रहा था, अनन्या एक साधारण सीनियर एनालिस्ट थी। लेकिन उस रात उसने वो USB खोल ली। स्क्रीन पर पहली फाइल खुलते ही उसके हाथ ठंडे पड़ गए। कंपनी के सबसे बड़े क्लाइंट के साथ हुए लाखों के अनियमित लेन-देन की डिटेल थी, जिसके साथ कुछ नाम भी थे — नाम जो ऑफिस के सबसे ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के थे।

अनन्या ने चारों तरफ देखा। खाली कॉरिडोर में सिर्फ उसकी सांसों की आवाज गूंज रही थी। वह जानती थी कि यह सिर्फ आंकड़े नहीं हैं। यह उस राज की शुरुआत है जो इस मल्टीनेशनल कंपनी की नींव हिला सकता है। यहां हर कोई मुस्कुराता हुआ चेहरा रखकर दूसरों की पीठ में छुरा भोंकने को तैयार था।

उसके मैनेजर विक्रम सिंह, जो हमेशा उसकी तारीफ करते थे, CEO रुद्रांश खन्ना, जो कंपनी को अपने परिवार की तरह चलाते थे, और उसकी सबसे अच्छी सहेली सीमा — सबकी परतें अब धीरे-धीरे खुलने वाली थीं।

जैसे ही अनन्या दूसरी फाइल खोलने जा रही थी, उसका फोन बज उठा। स्क्रीन पर अज्ञात नंबर। उसने कॉल उठाई।

“अनन्या… जो तुम देख रही हो, उसे मत देखो। वरना तुम्हें भी वही हादसा हो जाएगा जो आर्यन को हुआ था।”

फोन कट गया।

अनन्या के हाथ कांप रहे थे। आर्यन? वह सहकर्मी जो दो महीने पहले अचानक गायब हो गया था?

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