कर्म का शिकंजा

कर्म का शिकंजा
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मुंबई के सबसे प्रभावशाली उद्योगपति विक्रम सिंघानिया के पास दौलत, सत्ता और सम्मान—सब कुछ था।
लेकिन एक सुबह उसकी मेज़ पर बिना नाम की एक चिट्ठी मिली।

उसमें सिर्फ़ पाँच शब्द लिखे थे—
“कर्म का शिकंजा कस चुका है।”
विक्रम ने इसे मज़ाक समझकर फेंक दिया।
लेकिन उसी दिन उसके सबसे भरोसेमंद सहयोगी की संदिग्ध मौत हो गई।

अगले सप्ताह कंपनी में करोड़ों का घोटाला उजागर हुआ।
फिर उसका बेटा अचानक लापता हो गया।
हर घटना से पहले वही अनाम चिट्ठी आती रही।
लोग कहते हैं—यह ऊपर वाले का न्याय है।
लेकिन एसीपी आरव राठौड़ की जाँच बताती है कि कोई इंसान पच्चीस साल पुराने अपराधों का हिसाब बराबर कर रहा है।

यह कहानी कर्म को किसी अलौकिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि इंसान के अपने किए हुए कर्मों, अपराधबोध और वर्षों पुराने सच के रूप में पेश करती है।

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