साठ साल की शादी…
हजारों सुबहें…
लाखों बातें…
और अनगिनत यादें…
दादाजी हरिनारायण जोशी और दादी सावित्री जोशी की शादी को पूरे 60 साल हो चुके थे।
पूरा परिवार उनकी शादी की सालगिरह मना रहा था।
हँसी, तस्वीरें, बच्चों की शरारतें…
सब कुछ खुशियों से भरा था।
तभी उनका पोता आरव मुस्कुराते हुए पूछ बैठा—
“दादाजी… पूरी ज़िंदगी सिर्फ़ दादी से ही प्यार कैसे किया?”
कुछ पल के लिए पूरा घर शांत हो गया।
हरिनारायण जी ने सावित्री की ओर देखा…
हल्का-सा मुस्कुराए…
और बहुत ही साधारण शब्दों में कहा—
“बेटा… हमारे ज़माने में अगर कोई चीज़ टूट जाती थी… तो उसे बदलते नहीं थे… उसे प्यार से जोड़ते थे। रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।”
बस…
इतना सुनना था कि पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।
लेकिन किसी को नहीं पता था…
कि इस एक जवाब के पीछे…
संघर्ष, गरीबी, अधूरे सपने, बीमारी, बिछड़ने का डर, माफ़ियाँ, त्याग और साठ वर्षों की अनगिनत अनकही कहानियाँ छिपी थीं।
अब सवाल था—
क्या सचमुच ऐसा प्रेम आज भी संभव है…
जो आख़िरी साँस तक कभी न बदले?
All Chapters
- अध्याय 1: साठ साल का एक सवाल
- अध्याय 2: पहली मुलाकात और अनकही शपथ
- अध्याय 3: गरीबी की आग में तपता प्रेम
- अध्याय 4: टूटते सपने और जुड़ते रिश्ते
- अध्याय 5: गलतफहमियों की काली रातें
- अध्याय 6: बीमारी, त्याग और साथ का वचन
- अध्याय 7: परिवार की जड़ें और नई पत्तियाँ
- अध्याय 8: बुढ़ापे की ठंडी शामें
- अध्याय 9: यादों की अंतिम बारिश
- अध्याय 10: आख़िरी साँस तक
