घने जंगल…
ऊँचे पहाड़…
नदियों की कलकल…
और उन्हीं के बीच बसा था एक छोटा-सा आदिवासी गाँव महुआगढ़।
यहाँ रहने वाले लोगों के लिए जंगल सिर्फ़ लकड़ी नहीं था…
वह उनका घर था।
उनकी पहचान था।
उनकी साँस था।
लेकिन एक दिन…
कुछ बड़े लोग उस जंगल को विकास के नाम पर खाली करवाना चाहते थे।
गाँव वालों से कहा गया—
“यह तुम्हारे भविष्य के लिए है।”
लेकिन धीरे-धीरे लोगों को महसूस होने लगा…
कि उनका भविष्य नहीं…
उनकी पूरी दुनिया छीनी जा रही है।
इसी बीच गाँव का एक युवा शिक्षक बिरसा कश्यप कुछ ऐसे दस्तावेज़ों तक पहुँच जाता है…
जो बताते हैं कि इस पूरे प्रोजेक्ट के पीछे एक बड़ा भ्रष्ट खेल छिपा हुआ है।
उधर पत्रकार अनन्या सेन इस क्षेत्र में रिपोर्टिंग करने आती है।
वह देखती है कि लोगों की आवाज़ कहीं दर्ज ही नहीं हो रही।
डर…
धमकियाँ…
और रहस्यमयी हादसे…
सब मिलकर एक ऐसा सन्नाटा बना चुके थे…
जहाँ सिर्फ़ जंगल नहीं…
इंसानों की उम्मीद भी कट रही थी।
अब सवाल था—
क्या महुआगढ़ अपनी ज़मीन और पहचान बचा पाएगा?
क्या सच दुनिया के सामने आएगा?
या आदिवासियों की चीख हमेशा जंगलों में ही गूँजती रह जाएगी?
