लोग कहते थे…
“एक आदमी दुनिया नहीं बदल सकता।”
लेकिन…
एक आदमी…
एक साइकिल…
और कुछ पुरानी किताबों ने पूरे इलाके की सोच बदल दी।
बिहार के काल्पनिक कस्बे सूर्यमठ में रहने वाला निरंजन अवस्थी एक साधारण पुस्तकालय सहायक था।
न उसके पास पैसा था…
न कोई बड़ा पद…
न कोई राजनीतिक ताकत।
उसके पास सिर्फ़ किताबें थीं…
और यह विश्वास कि अगर हर बच्चे के हाथ में किताब होगी…
तो उसकी किस्मत भी बदल सकती है।
हर सुबह वह अपनी पुरानी साइकिल पर किताबों का बक्सा बाँधकर गाँव-गाँव जाता।
लोग उसका मज़ाक उड़ाते।
कोई उसे “किताब वाला पागल” कहता…
तो कोई “बेकार सपने देखने वाला।”
लेकिन धीरे-धीरे…
जिन बच्चों ने पहली बार उसी से किताबें ली थीं…
वे अपने परिवारों और पूरे समाज में बदलाव की नई कहानी लिखने लगे।
इसी बीच कुछ प्रभावशाली लोग उसके इस अभियान से परेशान होने लगे।
क्योंकि पढ़ा-लिखा समाज…
सवाल पूछना सीख जाता है।
अब सवाल था—
क्या निरंजन का यह शांत ज्ञान आंदोलन सफल होगा?
या उसकी किताबों की क्रांति…
शुरू होने से पहले ही दबा दी जाएगी?
All Chapters
- अध्याय 1: साइकिल और सपना
- अध्याय 2: पहली किताब, पहला बीज
- अध्याय 3: विरोध की आँधी
- अध्याय 4: वैदेही का साथ और हरिराम काका का आशीर्वाद
- अध्याय 5: बदलते परिवार, बदलते सपने
- अध्याय 6: राघव चौबे का क्रोध
- अध्याय 7: ज्ञान की ज्योति फैलती हुई
- अध्याय 8: संकट की घड़ी
- अध्याय 9: लड़ाई का सबसे कठिन मोड़
- अध्याय 10: क्रांति का फल और अनंत उम्मीद
