इंदौर…
जहाँ…
हर गली…
अपने स्वाद…
अपनी भाषा…
और…
अपनी मुस्कान के लिए जानी जाती है।
छप्पन दुकान के पास…
एक छोटी-सी…
पोहे की दुकान…
“जोशी पोहा सेंटर”…
जहाँ…
हर सुबह…
सैकड़ों लोग आते थे।
उसी भीड़ में…
एक लड़का…
आरविंद मालवीय…
हर दिन…
सिर्फ़…
एक चेहरे का इंतज़ार करता था।
वह लड़की…
मीरा सोनी…
जो…
बिना कुछ कहे…
पोहा लेकर…
चली जाती थी।
एक दिन…
वह अचानक…
आना बंद कर देती है।
और…
उसी दिन से…
आरविंद की…
ज़िंदगी…
एक नए सफ़र पर निकल पड़ती है…
जहाँ…
उसे…
सिर्फ़…
अपना प्यार नहीं…
बल्कि…
खुद को भी…
ढूँढ़ना था।
