उत्तराखंड के घने देवदार जंगलों के बीच बसे शांतिधाम कस्बे में लोग रात होते ही अपने घरों के दरवाज़े अंदर से बंद कर लेते थे। क्योंकि उन्हें अंधेरे से नहीं, अकेलेपन से डर लगता था।
कहा जाता था—जो इंसान सबसे ज़्यादा अकेला होता है, उसी के पास वह आती है। वह धीरे से पीछे खड़ी होती है और बिना कुछ कहे उसे गले लगा लेती है। पहले सुकून मिलता है, फिर नींद आती है… और सुबह सिर्फ़ उसकी निर्जीव देह मिलती है।
जब मनोवैज्ञानिक लेखक आर्यमान त्रिवेदी इस रहस्य पर किताब लिखने वहाँ पहुँचता है, तो पहली ही रात उसे अपने कंधे पर किसी के हाथों की गर्माहट महसूस होती है।
