अरावली की पहाड़ियों के बीच बसे सूर्यगढ़ गाँव में एक ऐसा कुआँ था जिसके पास सूर्यास्त के बाद कोई नहीं जाता था। बुज़ुर्ग कहते थे— “यह साधारण कुआँ नहीं… इच्छाओं का कुआँ है।” कहानी थी कि सैकड़ों साल पहले एक साधु ने वहाँ तपस्या की थी। उसके बाद जो भी सच्चे मन से इच्छा माँगता, उसे वह मिल जाती।
लेकिन कुछ महीनों बाद उसकी ज़िंदगी से कुछ अनमोल हमेशा के लिए गायब हो जाता। लोग इसे अंधविश्वास समझते रहे। जब तक एक रात अदिति ने उस कुएँ में सिक्का डालकर सिर्फ़ इतना नहीं कहा— “भगवान… मेरी ज़िंदगी बदल दीजिए।” अगली सुबह उसकी हर इच्छा पूरी होने लगी। लेकिन हर खुशी के साथ कोई अपना उससे दूर होता चला गया।
