छुपा-छुपाया शहर

छुपा-छुपाया शहर
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काल्पनिक महानगर अर्कनगर तेजी से बदल रहा था।
पुराने मोहल्ले खत्म हो रहे थे।
काँच की इमारतें…
नए फ्लाईओवर…
लक्ज़री टाउनशिप…
और स्मार्ट ज़ोन…
शहर की नई पहचान बन रहे थे।
लेकिन शहर के पूर्वी हिस्से में स्थित नवरंग बस्ती इस विकास से लगभग बाहर थी।
वहाँ तीन पीढ़ियों से रहने वाले परिवार…
धीरे-धीरे एक अजीब समस्या से जूझने लगे।
पहले लोगों को छोटी बातें भूलने लगीं।
किस दुकान से सामान लेते थे।
पुराने पड़ोसी का नाम।
बचपन का स्कूल।
फिर…
यादों में बड़े खाली हिस्से बनने लगे।
किसी ने अपनी पत्नी को पहचाना नहीं।
एक महिला अपने ही बेटे को किरायेदार समझ बैठी।
एक बुज़ुर्ग अपने घर से निकलकर उसी नई कॉलोनी में रहने पहुँच गया…
जिसका निर्माण उसकी पुरानी जमीन पर प्रस्तावित था।
सबसे विचित्र बात—
यादें खोने के कुछ दिनों बाद…
इन लोगों के दस्तावेज़ भी बदलने लगते।
पुराने पते गायब।
प्रॉपर्टी रिकॉर्ड अपडेट।
डिजिटल तस्वीरें नदारद।
स्थानीय संस्थाओं की सदस्यता समाप्त।
मानो…
कोई केवल उनकी स्मृतियाँ नहीं…
उनके अस्तित्व का इतिहास भी मिटा रहा था।
खोजी पत्रकार वायना अरोड़ा इस मामले तक तब पहुँचती है जब उसका पूर्व स्कूल शिक्षक प्रभाकर सेन उसे सड़क पर देखकर कहता है—
“माफ कीजिए… मैं आपको नहीं जानता।”
जबकि…
दो दिन पहले ही…
उसी व्यक्ति ने उसे फोन करके कहा था—
“अगर मैं तुम्हें पहचानना बंद कर दूँ…
तो समझ जाना कि कहानी सच है।”
वायना मामले की तह तक जाती है।
जल्द ही उसकी मुलाकात होती है एसीपी सारंग देशमुख, न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट डॉ. अनहिता वर्मा, डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञ कियारा बसु और शहरी अभिलेख शोधकर्ता निर्वाण खत्री से।
लेकिन…
जांच का सबसे बड़ा झटका तब लगता है…
जब शहर के आधिकारिक डिजिटल नक्शे से…
पूरी नवरंग बस्ती…
एक रात में…
गायब हो जाती है।

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