एक सच्चे शिक्षक की कहानी
एक छोटे से गाँव…जहाँ बच्चे…सपने तो देखते थे…लेकिन उन्हें पूरा करने का रास्ता नहीं जानते थे। उसी गाँव के सरकारी […]
एक छोटे से गाँव…जहाँ बच्चे…सपने तो देखते थे…लेकिन उन्हें पूरा करने का रास्ता नहीं जानते थे। उसी गाँव के सरकारी […]
कॉलेज की लाइब्रेरी…जहाँ…एक किताब…दो हाथों ने…एक साथ उठाई। एक हाथ…अर्णव राजदान का।दूसरा…ईशिता सैनी का। एक छोटी-सी मुलाकात…धीरे-धीरे…दोस्ती में बदली।दोस्ती…मोहब्बत में।और…मोहब्बत…ज़िंदगी
पुराने शहर की…एक भूली हुई लाइब्रेरी…जहाँ वर्षों से…कोई नहीं गया था।धूल से ढकी…टूटी हुई अलमारियों के बीच…नक्ष अरोड़ा को…एक काली
अर्जुन सिंघल…शहर का सबसे सफल उद्योगपति।पैसा…नाम…शोहरत…सब कुछ उसके पास था।रिश्तेदार…दोस्त…और समाज…हर कोई उसके आसपास मंडराता था। लेकिन…एक रात…उसकी कंपनी पर
एक बारिश भरी शाम…रेलवे स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म नंबर पाँच पर…विहान अरोड़ा की नज़र…एक लड़की पर पड़ी।वह अकेली थी…भीगी हुई…डरी हुई…और
बारह साल पहले…एक प्रतिष्ठित परिवार…एक ही रात में बिखर गया। एक हत्या…एक कथित आत्महत्या…और अदालत का अंतिम फैसला।फाइल बंद हो
अन्वी राठौर…एक सफल आर्किटेक्ट…जिसकी ज़िंदगी बिल्कुल सामान्य थी।एक प्यार करने वाला परिवार…अच्छा करियर…और जल्द होने वाली शादी। लेकिन…एक सड़क दुर्घटना
हर सुबह…ठीक आठ बजे…शहर के एक पुराने बस स्टॉप पर…दो अजनबी…बिना कुछ कहे…एक-दूसरे को देखते थे।ना कोई परिचय…ना कोई बातचीत…सिर्फ़
वीर प्रताप राठौर…एक ऐसा इंसान…जो रिश्तों को पैसे से ऊपर मानता था।उसका विश्वास था…कि सच्चे लोग कभी धोखा नहीं देते।लेकिन…एक
शहर के दो सबसे प्रतिष्ठित परिवार…चौहान और सिसोदिया…पिछले पच्चीस वर्षों से…एक-दूसरे का चेहरा तक देखना पसंद नहीं करते थे। किसी