खोया हुआ बेटा
पच्चीस साल पहले…एक धार्मिक मेले की भीड़ में…सिर्फ़ पाँच साल का…आर्यवीर सिंह…अचानक गायब हो गया।पूरे शहर में…उसकी तलाश हुई।पोस्टर लगे…इनाम […]
पच्चीस साल पहले…एक धार्मिक मेले की भीड़ में…सिर्फ़ पाँच साल का…आर्यवीर सिंह…अचानक गायब हो गया।पूरे शहर में…उसकी तलाश हुई।पोस्टर लगे…इनाम […]
एक छोटे से गाँव…जहाँ बच्चे…सपने तो देखते थे…लेकिन उन्हें पूरा करने का रास्ता नहीं जानते थे। उसी गाँव के सरकारी
कॉलेज की लाइब्रेरी…जहाँ…एक किताब…दो हाथों ने…एक साथ उठाई। एक हाथ…अर्णव राजदान का।दूसरा…ईशिता सैनी का। एक छोटी-सी मुलाकात…धीरे-धीरे…दोस्ती में बदली।दोस्ती…मोहब्बत में।और…मोहब्बत…ज़िंदगी
अर्जुन सिंघल…शहर का सबसे सफल उद्योगपति।पैसा…नाम…शोहरत…सब कुछ उसके पास था।रिश्तेदार…दोस्त…और समाज…हर कोई उसके आसपास मंडराता था। लेकिन…एक रात…उसकी कंपनी पर
पुरानी दिल्ली की…एक शांत कॉलोनी।जहाँ…हर कोई…हर किसी को जानता था।कौन कब घर आता है…किसके घर कौन मेहमान आया…किसकी किससे लड़ाई
वीर प्रताप राठौर…एक ऐसा इंसान…जो रिश्तों को पैसे से ऊपर मानता था।उसका विश्वास था…कि सच्चे लोग कभी धोखा नहीं देते।लेकिन…एक
घने जंगल…ऊँचे पहाड़…नदियों की कलकल…और उन्हीं के बीच बसा था एक छोटा-सा आदिवासी गाँव महुआगढ़। यहाँ रहने वाले लोगों के
लोग कहते थे…“एक आदमी दुनिया नहीं बदल सकता।”लेकिन…एक आदमी…एक साइकिल…और कुछ पुरानी किताबों ने पूरे इलाके की सोच बदल दी।
आज अपराधी बंदूक लेकर नहीं आते…वे सिर्फ़ एक लिंक भेजते हैं।एक फोन कॉल…एक OTP…एक नकली वेबसाइट…एक फर्जी नौकरी…एक झूठा प्यार…और
कहते हैं…शहर इंसान को काम करना सिखाता है…लेकिन गाँव उसे इंसान बनना सिखाता है। दिल्ली में नौकरी न मिलने के