राजस्थान के चित्तौड़गढ़ के पास स्थित सूर्यगढ़ हवेली… जहाँ तीन पीढ़ियों से एक अजीब परंपरा चली आ रही थी। पूजा कक्ष की एक मोमबत्ती कभी बदली नहीं जाती थी। कहते थे वह परिवार की रक्षा करती है। लेकिन पिछले छह महीनों से हर बार उसके जलने के अगले दिन एक नई दुर्घटना, एक नई मौत या एक नई गुमशुदगी होने लगी। जब परिवार के सबसे बड़े उत्तराधिकारी विराज राठौड़ की मौत से पहले भी मोमबत्ती की लौ उसी दिशा में झुकती है, तो मामले की जांच एसीपी अथर्व चौहान को सौंपी जाती है। उनके साथ फॉरेंसिक विशेषज्ञ डॉ. ईरा सक्सेना और अग्नि एवं रासायनिक विश्लेषण विशेषज्ञ डॉ. अन्वी त्रिपाठी उस रहस्य की तह तक पहुँचते हैं… जहाँ हर लौ एक संदेश थी और हर संदेश एक हत्या की योजना।
