सिंघानिया परिवार…
देश के सबसे पुराने…
और सबसे अमीर कारोबारी परिवारों में से एक था।
अरबों की संपत्ति…
कई फैक्ट्रियाँ…
हज़ारों एकड़ ज़मीन…
और…
सदियों पुरानी हवेली।
परिवार के सभी लोगों को…
यकीन था…
कि दादाजी…
वीरेन्द्र सिंघानिया…
सब कुछ…
अपने बच्चों और पोतों के नाम कर जाएँगे।
लेकिन…
उनकी अंतिम वसीयत पढ़ते ही…
पूरा कमरा…
खामोश हो गया।
वकील ने कहा—
“इस साम्राज्य का एकमात्र उत्तराधिकारी… परिवार का कोई सदस्य नहीं है।”
कुछ ही क्षण बाद…
दरवाज़ा खुला।
एक साधारण कपड़ों में…
अनजान युवक…
अंदर आया।
वकील मुस्कुराया…
और बोला—
“मिलिए… यही हैं इस विरासत के असली वारिस।”
उस पल…
सिर्फ़ संपत्ति नहीं…
पूरे परिवार की सच्चाई…
कटघरे में खड़ी हो गई।
All Chapters
- अध्याय 1 — आख़िरी वसीयत
- अध्याय 2 — अनजान वारिस
- अध्याय 3 — हवेली में तूफ़ान
- अध्याय 4 — पुरानी तिजोरी
- अध्याय 5 — जन्म का रहस्य
- अध्याय 6 — छिपी हुई पहचान
- अध्याय 7 — विरासत का असली हक़
- अध्याय 8 — विश्वासघात
- अध्याय 9 — अदालत की दहलीज़
- अध्याय 10 — दादाजी का आख़िरी संदेश
- अध्याय 11 — गुप्त वारिस
- अध्याय 12 — विरासत से बड़ा रिश्ता
