सरिता, ४२ वर्षीय एक साधारण भारतीय महिला, पिछले बीस वर्षों से परिवार की हर खुशी, हर ज़रूरत और हर उम्मीद को अपने सपनों से ऊपर रखती आई है। पति की नौकरी, बच्चों की पढ़ाई, सास-ससुर की सेवा और घर की ज़िम्मेदारियों में उसकी अपनी इच्छाएँ कहीं खो सी गई हैं। वह हमेशा दूसरों के लिए जीती रही — कभी अपनी माँ बनकर, कभी पत्नी, कभी बहू।
लेकिन एक दिन एक अप्रत्याशित घटना उसके जीवन की दिशा बदल देती है। वह पहली बार खुद से सवाल करती है — “क्या मैंने कभी खुद को चुना है?” इस सवाल के साथ शुरू होती है उसकी आंतरिक यात्रा, जिसमें पुरानी यादें, टूटे सपने, रिश्तों की जटिलताएँ और समाज की अपेक्षाएँ उसे घेर लेती हैं।
“जब मैंने खुद को चुना” एक ऐसी भावनात्मक और प्रेरणादायक कहानी है जो हर उस महिला की ज़िंदगी को छू लेती है, जिसने कभी अपना स्वप्न त्याग दिया। यह कहानी संघर्ष, आत्मसम्मान, साहस और नई शुरुआत की है — जो पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती है कि असली खुशी दूसरों को खुश रखने में नहीं, बल्कि खुद को चुनने में है।
