काली चाबी

काली चाबी
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राजस्थान के काल्पनिक शहर अमरेगढ़ के बाहर स्थित कृष्णकोट हवेली में भटनागर परिवार तीन पीढ़ियों से रह रहा था। परिवार के मुखिया रघुवंश भटनागर की मृत्यु के बाद सभी उत्तराधिकारी वसीयत के लिए हवेली लौटते हैं। वसीयत पढ़े जाने से ठीक एक दिन पहले… घर की पुरानी तिजोरी से… एक काली लोहे की चाबी गायब हो जाती है। उस चाबी के बारे में परिवार की वरिष्ठ सदस्य मालविका देवी केवल इतना बताती हैं— “यह किसी कमरे की चाबी नहीं है।” अगली सुबह… वही चाबी… परिवार के सबसे बड़े बेटे प्रणय भटनागर की तस्वीर के नीचे रखी मिलती है। कुछ घंटों बाद… वह एक रहस्यमय सड़क दुर्घटना से बाल-बाल बचता है। परिवार इसे संयोग मानता है। लेकिन अगले दिन… चाबी किसी और सदस्य के पास पहुँच जाती है। और… हर नई सुबह… किसी का अतीत खुलने लगता है। पुरानी प्रेम कहानी। बदली गई वसीयत। छिपा हुआ बच्चा। फर्जी जमीन दस्तावेज़। और… पच्चीस वर्ष पुरानी एक संदिग्ध मौत। जब परिवार के पुराने वकील की हत्या हो जाती है… तो जांच की जिम्मेदारी एसीपी वेत्रा सेन को सौंपी जाती है। उनके साथ फॉरेंसिक मेटल विशेषज्ञ डॉ. नीलाय मुखर्जी, व्यवहार विश्लेषक डॉ. रागिनी कौल और स्थापत्य अभिलेख विशेषज्ञ तविष मेहता काली चाबी के इतिहास और हर सुबह बदलते “निशाने” की जांच शुरू करते हैं। लेकिन… जल्द ही उन्हें पता चलता है— चाबी कभी किसी इंसान को नहीं चुन रही थी। कोई… उसे उन लोगों तक पहुँचा रहा था… जिनके पास… एक बंद सच की अगली परत थी।

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