आगे बढ़ने से पहले:
इस कहानी में ऐसे विषय और भाषा-शैली हो सकती है जो हर पाठक के लिए सहज न हो।
कृपया अपनी समझ और विवेक से आगे बढ़ें।
काल्पनिक शहर शिवरात्रि नगर अपने पुराने पुस्तकालयों, हवेलियों और विश्वविद्यालयों के लिए प्रसिद्ध था। आर्यमान व्यास 38 वर्षीय manuscript conservator है। उसका काम है पुरानी पांडुलिपियों को पढ़ना, उनकी उम्र पहचानना, स्याही, कागज़ और binding से उनका इतिहास निकालना। इसलिए जब उसे “मृतकों की किताब” मिलती है, वह supernatural explanation पर विश्वास नहीं करता। विवान की मृत्यु के बाद उसका दृष्टिकोण बदलता है। वह किताब की forensic जांच करवाता है। परिणाम विचित्र हैं। कागज़ अलग-अलग कालखंडों के हैं। कुछ पन्ने लगभग 130 वर्ष पुराने, कुछ 70 वर्ष, कुछ नए। स्याही भी एक नहीं। मानो किताब किसी एक समय में बनाई ही न गई हो। फिर आर्यमान को पुरानी newspaper archives में वही pattern मिलता है। हर कुछ दशकों में अचानक ऐसे लोगों की मौतें हुईं जिनके नाम किसी निजी diary में पहले दर्ज थे। और हर record में एक वस्तु का उल्लेख—काली किताब। उसी समय मामले में प्रवेश करती हैं डीसीपी अमृता नायर, forensic document expert डॉ. नीलोत्पल घोष और clinical psychologist डॉ. रियाशा वर्मा। लेकिन जांच का सबसे खतरनाक मोड़ तब आता है जब पुलिस किताब को evidence locker में बंद कर देती है। CCTV लगातार चालू। कमरे में कोई प्रवेश नहीं करता। रात 3:07 बजे किताब स्वयं खुलती है। और अगला नाम लिखती है—“डीसीपी अमृता नायर”। अब जांच करने वाला भी किताब का अगला शिकार है।
All Chapters
- अध्याय 1 — पहला नाम
- अध्याय 2 — दूसरी रात
- अध्याय 3 — मेरे भाई का नाम
- अध्याय 4 — किताब पुलिस के पास
- अध्याय 5 — अगला नाम: अमृता
- अध्याय 6 — 130 वर्ष पुराने नाम
- अध्याय 7 — दो तरह की स्याही
- अध्याय 8 — जिसने नाम लिखे
- अध्याय 9 — नाम बदलने की कीमत
- अध्याय 10 — मृतकों का लेखक
- अध्याय 11 — मेरा अपना नाम
- अध्याय 12 — मृतकों की किताब
