सालों तक जिन बच्चों की हँसी से एक घर गूंजता रहा, वही घर एक दिन अचानक खामोश हो जाता है। सविता (48) और राजेश (52) ने अपना पूरा जीवन अपने बेटे और बेटी के भविष्य के लिए समर्पित कर दिया। अच्छी पढ़ाई, बेहतर करियर और बड़े सपनों के लिए दोनों बच्चों को महानगर भेज दिया गया।
अब वही आँगन, जहाँ कभी सुबह से शाम तक शोर रहता था, दिनभर सूना पड़ा रहता है। दीवारों पर लगी तस्वीरें मुस्कुराती हैं, कमरों में रखे खिलौने धूल जमा रहे हैं, और फोन पर बच्चों की दो मिनट की बातचीत अब पूरे दिन की सबसे बड़ी खुशी बन गई है। धीरे-धीरे सविता को एहसास होता है कि उसने पूरी जिंदगी सिर्फ़ “माँ” बनकर जी है। उसकी अपनी पहचान कहीं पीछे छूट गई है। राजेश बाहर से मजबूत दिखाई देता है, लेकिन अंदर ही अंदर वह भी खालीपन से लड़ रहा है।
क्या बच्चों के चले जाने के बाद जीवन सचमुच खत्म हो जाता है? या यहीं से शुरू होती है इंसान की अपनी असली कहानी?
