पुणे की मानसून रातें हमेशा से रहस्यमयी रही हैं। कोथरुड के उस पुराने, आइवरी-क्लाइंब्ड बंगले में बारिश की बूंदें छत पर टपक रही थीं, जैसे कोई पुरानी यादें रो रही हों। रात के 2:17 बजे। विक्रम मेहता का शव ड्रॉइंग रूम के बीचों-बीच फर्श पर पड़ा था। सफेद शर्ट पर लाल खून का फूल-सा फैलाव। सीने में गहरा चाकू का घाव। आंखें अभी भी खुली थीं, जैसे मौत के ठीक पहले किसी को देखकर हैरान हो गया हो।
बाहर बारिश इतनी तेज थी कि सड़क पर पानी की धार बह रही थी। पुलिस की सायरन दूर से आ रही थी, लेकिन अभी पहुंची नहीं थी।
अनन्या मेहता — विक्रम की पत्नी — सोफे के कोने पर बैठी थी। उसके गालों पर आंसू थे, लेकिन आंखों में कुछ और था… शायद डर, शायद दर्द, या शायद कुछ और। उसके हाथ कांप रहे थे। उसने धीरे से कहा, “मैंने… मैंने उसे नहीं मारा।”
लेकिन उसकी उंगलियों पर अभी भी हल्के खून के निशान थे।
पास ही, विक्रम का बिजनेस पार्टनर राहुल कपूर खिड़की के पास खड़ा था, सिगरेट का धुआं बारिश में घुल रहा था। उसकी आंखें अनन्या पर टिकी थीं — नफरत, चाहत, या दोनों का मिश्रण?
और शहर के दूसरे छोर पर, विक्रम की पुरानी प्रेमिका माया सिंह कैफे ‘द रेन ट्री’ में अकेली बैठी थी। उसके फोन पर विक्रम का आखिरी मैसेज: “आज रात मिलते हैं। सब खत्म करना है।”
बारिश और तेज हो गई। पुणे की इस रात में प्यार, धोखा और खून एक-दूसरे में उलझ गए थे। कौन था असली कातिल? क्या अनन्या का रोना सच था, या सिर्फ एक परफेक्ट एक्ट? क्या राहुल की आंखों में जलन थी, या कुछ और गहरा? और माया… क्या वो सिर्फ एक पुरानी याद थी, या एक जिंदा खतरा?
यह कहानी है एक अधूरे इश्क़ की, जो मानसून की बारिश में बिखर गया… और जिसके टुकड़े अब एक-एक करके इकट्ठे होंगे।
