नंदिता की उम्र 40 साल हो चुकी थी। शादी के 18 साल, दो बच्चे, एक स्थिर लेकिन रूटीन जीवन। कभी वह सपनों की दुनिया में खोई रहती थी – कैनवास पर रंगों से कहानियां बुनती, प्रदर्शनियों में घूमती। लेकिन अब घर, बच्चों की पढ़ाई, राजेश की नौकरी और सास-ससुर की देखभाल ने उसके हर सपने को एक कोने में धकेल दिया था। फिर भी, दिल के किसी कोने में वह पुरानी नंदिता जिंदा थी – जो प्यार करती थी, जो चाहती थी कि कोई उसे सिर्फ़ माँ या पत्नी नहीं, बल्कि एक औरत के रूप में देखे। अब “दूसरी पारी” की शुरुआत हो रही थी। क्या वह अपने लिए जी पाएगी? और क्या राजेश, जो कभी उसका सबसे करीबी था, अब भी उसके साथ चल पाएगा?
