पिता की मृत्यु के बाद 35 वर्षीय कबीर अवस्थी अपनी पत्नी इरा के साथ लगभग पच्चीस साल बाद अपने पुराने पुश्तैनी घर लौटता है। ऊपर की मंजिल पर एक कमरा हमेशा से खाली रखा गया है—न बिस्तर, न अलमारी, न तस्वीर, सिर्फ बंद खिड़की और फीकी दीवारें। परिवार का कहना है कि वह कमरा कभी इस्तेमाल ही नहीं हुआ। लेकिन पहली रात ठीक 1:42 बजे कबीर की नींद उस कमरे से आती एक बच्ची की हँसी से खुलती है। इरा भी आवाज सुनती है। दोनों दरवाजा खोलते हैं—कमरा खाली है। तभी अंधेरे में एक बच्ची फुसफुसाती है, “कबीर भैया… इस बार मुझे ढूँढ लोगे?” कबीर को वही हँसी याद है, वही खेल, वही आवाज। पर उसे यह नहीं पता कि वह बच्ची कौन थी—क्योंकि उसके परिवार की कहानी में कभी कोई छोटी बहन थी ही नहीं।
All Chapters
- अध्याय 1 – खाली कमरे में हँसी
- अध्याय 2 – मुझे ये हँसी याद है
- अध्याय 3 – ये कमरा हमेशा खाली नहीं था
- अध्याय 4 – परी कौन थी?
- अध्याय 5 – अगर नहीं ढूँढ पाए तो मैं जीत गई
- अध्याय 6 – रात 1:42
- अध्याय 7 – वह कमरे से गायब नहीं हुई थी
- अध्याय 8 – बुआ उसे लेकर गई थीं
- अध्याय 9 – अस्पताल में कोई और थी
- अध्याय 10 – राजेंद्र को सच पता था
- अध्याय 11 – मैंने कहा था गायब हो जाना
- अध्याय 12 – खाली कमरा अब खाली नहीं था
