कुछ आवाज़ें…
कभी मरती नहीं।
वे सिर्फ इंतज़ार करती हैं…
सच सामने आने का।
उत्तर प्रदेश के छोटे कस्बे शिवपुर की एक शांत कॉलोनी में रहने वाला सात साल का दक्ष एक शाम अपने दोस्तों के साथ खेलते-खेलते अचानक गायब हो जाता है।
पूरा मोहल्ला उसे खोजता है।
पुलिस आती है।
पोस्टर लगते हैं।
तालाब, खेत, जंगल…
हर जगह तलाश होती है।
लेकिन दक्ष का कोई सुराग नहीं मिलता।
धीरे-धीरे लोग मान लेते हैं कि शायद वह कभी वापस नहीं आएगा।
लेकिन ठीक उसके गायब होने के सात दिन बाद…
हर रात ठीक 12 बजे…
मोहल्ले की किसी न किसी गली से एक बच्चे की खिलखिलाती हँसी सुनाई देने लगती है।
कोई उसे देख नहीं पाता।
लेकिन हर कोई उसकी आवाज़ सुनता है।
पहले लोग इसे भ्रम समझते हैं।
फिर एक-एक करके अजीब घटनाएँ शुरू होने लगती हैं।
दक्ष के खिलौने अपने आप जगह बदलने लगते हैं।
उसकी साइकिल हर सुबह किसी नई गली में खड़ी मिलती है।
और हर रात किसी न किसी घर के दरवाजे पर छोटे-छोटे गीले पैरों के निशान दिखाई देते हैं।
जब खोजी पत्रकार आर्या त्रिवेदी इस घटना की जांच शुरू करती है, तो उसे एहसास होता है कि यह सिर्फ एक गुमशुदगी का मामला नहीं है।
पूरे मोहल्ले में कोई ऐसा है…
जो वर्षों से एक भयानक सच छुपाए बैठा है।
और शायद…
दक्ष गायब नहीं हुआ था।
किसी ने उसे गायब किया था।
अब सवाल था—
हर रात सुनाई देने वाली हँसी किसकी है?
दक्ष आखिर कहाँ गया?
और मोहल्ले का कौन सा इंसान इतने वर्षों से इस सच के साथ जी रहा है?
